पार्षद से मुख्यमंत्री बने मोतीलाल वोरा की कहानी...


भोपाल (जोशहोश डेस्क) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा का आज निधन हो गया है । खराब सेहत की वजह से मोतीलाल वोरा को कल रात एस्कॉर्ट हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था। जहां उन्होंने 93 साल की  उम्र में अंतिम सांस ली। वोरा का कल ही जन्मदिन था। कुछ दिनों पहले वह कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे।

मोतीलाल वोरा लंबे समय तक कांग्रेस को कोषाध्यक्ष रहे। वह मध्यप्रदेश के 2 बार मुख्यमंत्री और उत्तरप्रदेश के राज्यपाल भी रह चुके थे। वोरा ने राजनीति की शुरुआत पार्षद से की थी और मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया था।

पार्षद से मुख्यमंत्री बने वोरा

सन् 1970 के दौरान मोतीलाल वोरा, प्रजा समाजवादी पार्टी के नेता थे और दुर्ग से एक वार्ड के पार्षद थे। साइकिल पर चलने वाले वोरा पत्रकार भी थे, और गरीब लोगों के लिए दुर्ग में आवास व्यवस्था के लिए अक्सर लड़ते थे। सन् 1972 का जब चुनाव आया तो द्वारका प्रसाद मिश्र ने किशोरीलाल शुक्ल से कहा कि दुर्ग से एक ऐसे उम्मीदवार की तलाश है जो मोहनलाल बाकलीवाल की जगह ले सके। मोहनलाल बाकलीवाल दुर्ग के जिला काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और विधायक थे और मूलचंद देशलहरा एवं महंत लक्ष्मीनारायण दास के निकटमत व्यक्ति माने जाते थे। किशोलीलाल शुक्ल ने मिश्र को मोतीलाल वोरा के नाम सुझाया। हालांकि वह प्रजा सोसालिस्ट पार्टी के सदस्य थे पर त्यागपत्र देने को तैयार थे। मिश्र ने वोरा को बुलाया तथा उन्हें टिकट दिया। किशोरीलाल शुक्ल और अन्य लोगों ने वोरा की मदद की। वोरा चुन लिए गए और विधायक हो गए। किस्मत की खूबी यह है कि राजनीति में पहले छोटे भाई गोविन्दलाल वोरा आगे थे, अब गोविन्दलाल वोरा पीछे हो गए और बड़े भाई जो कि संवाददाता थे वे सामने आ गए। 

किशोरीलाल शुक्ल ने बाद में प्रकाशचंद सेठी को विश्वास में लेकर न केवल अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया, वरन् उन्होंने मोतीलाल वोरा को मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम का उपाध्यक्ष बनवाया। उस समय नीमच के सीताराम जाजू राज्य परिवहन के अध्यक्ष थे। बहुत बजुर्ग होने के कारण वे सदैव बीमार रहते थे। इसका पूरा-पूरा लाभ मोतीलाल वोरा ने लिया। उनकी अनुपस्थित में वे खूब दौरे करते और अखबारों में छपते 40 राज्य परिवहन का वह दायित्व वोरा ने पूरी निष्ठा से निभाया था। करोड़ों का लेन-देन करने वाले इस संस्थान में हेराफेरी के बहुत अवसर होते थे।

उनके उपाध्यक्ष बनते ही परिवहन अधिकारियों ने बड़े शहरों के दौरों का कार्यक्रम तैयार कर लिया। अध्यक्ष सीताराम जाजू ने दौरा कार्यक्रम को मंजूरी दे दी पर खुद जाने की बजाय वोरा का नाम प्रस्तावित कर दिया। वोरा ने सारा कार्यक्रम ही रद्द कर दिया। उनका कहना था कि ‘‘जब वे एक छोटी परिवहन कंपनी के प्रबंध-संचालक थे तब मोटरपार्ट्स विक्रेता उनके चक्कर लगाते थे, अब इतना बड़ा प्रतिष्ठान हाथ में है तो उन्हें महानगरों का दौरा करने की क्या जरूरत है? जिसे अपना माल बेचना होगा, वह खुद हमारे पास चलकर आयेगा।’’ परिवहन अधिकारियों के लिए यह एक नया अनुभव था। वोरा ने महानगरों के सैर-सपाटे नहीं किये, किन्तु घाटे में चल रही राज्य-परिवहन की वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए सारे प्रदेश का दौरा कर डाला।

स्वभाव से मोतीलाल वोरा बहुत मेहनती थे।  सन् 1998की गर्मियों में दुर्ग लोकसभा चुनाव के समय का जिक्र करते हुए राजनीतिनामा के लेखक लिखते हैं कि - ‘‘द वीक’’ के संवाददाता के रूप में मेरा उनसे मिलना राजनाँदगाँव मेंहुआ। एक दिन पहले जब बात हुई तो उन्होंने मुझे सुबह सात बजे का समय, राजनाँदगाँव के ही एक तेन्दूपत्ता गोदाम से लगे हुए घर में, मिलने का दिया। संभवतः उस घर में वे चुनाव के दौरान रह रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि सवेरे-सवेरे कोई नेता कैसे तैयार हो सकता है पर वे तो पराठा, आलू टमाटर की सब्जी खाकर बिल्कुल तैयार थे। पहुँचते ही उन्होंने मुझे चाय पिलाते हुए कुछ शुरूआती बात की और अपनी एम्बेसडरकार में बिठा कर चुनाव दौरे पर निकल पड़े। रास्ते में जब मैंने धोती में से झाँकते हुए उनके पैर देखे तो वे सूजे हुए थे। बाद में पता चला कि वे रात बारह बजे तक चुनावप्रचार करते है और सुबह जल्दी निकल लेते है।

मोतीलाल वोरा मध्यप्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं। दोनों बार उन्हें अर्जुन सिंह के छोड़ने पर यह पद मिला। पहली बार जब अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाकर सन् 1985 में भेजा गया तब मोतीलाल वोरा को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। उसके बाद दूसरी बार वोरा मुख्यमंत्री जनवरी 1989 में बने जब अर्जुन सिंह को चुरहट लाटरी विवाद में इस्तीफा देना पड़ा। 

[साभार : राजनीतिनामा मध्यप्रदेश]